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शान्ति पर्व
अध्याय २८
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अश्मो उवाच
अकिञ्चनाश्च दृश्यन्ते पुरुषाश्चिरजीविनः |  २८   क
समृद्धे च कुले जाता विनश्यन्ति पतङ्गवत् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति