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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
स तु देवान्सगन्धर्वाञ्जित्वा धुन्धुरमर्षणः |  ६   क
ववाध सर्वानसकृद्देवान्विष्णुं च वै भृशम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति