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आदि पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
या कन्या दुहिता तस्या मत्स्या मत्स्यसगन्धिनी |  ५४   क
राज्ञा दत्ताथ दाशाय़ इय़ं तव भवत्विति |  ५४   ख
रूपसत्त्वसमाय़ुक्ता सर्वैः समुदिता गुणैः ||  ५४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति