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शान्ति पर्व
अध्याय २८
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अश्मो उवाच
स यज्ञशीलः प्रजने निविष्टः; प्राग्व्रह्मचारी प्रविभक्तपक्षः |  ५५   क
आराधय़न्स्वर्गमिमं च लोकं; परं च मुक्त्वा हृदय़व्यलीकम् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति