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शान्ति पर्व
अध्याय २८
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व्यास उवाच
तथा त्वमप्यच्युत मुञ्च शोक; मुत्तिष्ठ शक्रोपम हर्षमेहि |  ५८   क
क्षात्रेण धर्मेण मही जिता ते; तां भुङ्क्ष्व कुन्तीसुत मा विषादीः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति