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वन पर्व
अध्याय ६६
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वृहदश्व उवाच
अज्ञाय़मानापि सती सुखमस्म्युषितेह वै |  १६   क
सर्वकामैः सुविहिता रक्ष्यमाणा सदा त्वय़ा ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति