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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
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व्राह्मण उवाच
गन्धान्न जिघ्रामि रसान्न वेद्मि; रूपं न पश्यामि न च स्पृशामि |  १   क
न चापि शव्दान्विविधाञ्शृणोमि; न चापि सङ्कल्पमुपैमि किञ्चित् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति