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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
सुखार्हः स हि राजर्षिर्न सुखं तन्महावनम् |  ४   क
किमवस्थः समासाद्य प्रज्ञाचक्षुर्हतात्मजः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति