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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
क्व ते तदमलं छत्रं व्यजनं क्व च पार्थिव |  १७   क
सा च ते महती सेना क्व गता पार्थिवोत्तम ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति