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सभा पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
तं दृष्ट्वा विस्मितो राजा जगाम शिरसा कविम् |  २०   क
चक्रे प्रसादं च तदा तस्य राज्ञो विभावसुः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति