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सभा पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
वरेण छन्दय़ामास तं नृपं स्विष्टकृत्तमः |  २१   क
अभय़ं च स जग्राह स्वसैन्ये वै महीपतिः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति