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द्रोण पर्व
अध्याय ९६
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सञ्जय़ उवाच
रुक्माङ्गदशिरस्त्राणो रुक्मवर्मसमावृतः |  ४   क
रुक्मध्वजवरः शूरो मेरुशृङ्ग इवावभौ ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति