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सभा पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
निषादभूमिं गोशृङ्गं पर्वतप्रवरं तथा |  ५   क
तरसा व्यजय़द्धीमाञ्श्रेणिमन्तं च पार्थिवम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति