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सभा पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
स चास्य प्रतिजग्राह शासनं प्रीतिपूर्वकम् |  ५१   क
तच्च कालकृतं धीमानन्वमन्यत स प्रभुः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति