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सभा पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
वासांसि च महार्हाणि मणींश्चैव महाधनान् |  ५३   क
न्यवर्तत ततो धीमान्सहदेवः प्रतापवान् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति