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वन पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
दान्तं यच्च सभामध्ये आसनं रत्नभूषितम् |  ११   क
दृष्ट्वा कुशवृसीं चेमां शोको मां रुन्धय़त्ययम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति