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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
एताः शिवा घोरनादा दिशं दक्षिणपश्चिमाम् |  ७४   क
आस्थाय़ विरुवन्त्युग्राः कम्पय़न्त्यो मनो मम ||  ७४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति