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वन पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
या वै त्वा कौशिकैर्वस्त्रैः शुभ्रैर्वहुधनैः पुरा |  १४   क
दृष्टवत्यस्मि राजेन्द्र सा त्वां पश्यामि चीरिणम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति