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वन पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
सर्वांस्तानद्य पश्यामि वने वन्येन जीवतः |  १८   क
अदुःखार्हान्मनुष्येन्द्र नोपशाम्यति मे मनः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति