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वन पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
भीमसेनमिमं चापि दुःखितं वनवासिनम् |  १९   क
ध्याय़न्तं किं न मन्युस्ते प्राप्ते काले विवर्धते ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति