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वन पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
दर्शनीय़ं च शूरं च माद्रीपुत्रं युधिष्ठिर |  ३१   क
सहदेवं वने दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति