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वन पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदस्य कुले जातां स्नुषां पाण्डोर्महात्मनः |  ३२   क
मां ते वनगतां दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति