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वन पर्व
अध्याय २८२
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मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र भार्यासहाय़ः स वृतो वृद्धैस्तपोधनैः |  ७   क
आश्वासितो विचित्रार्थैः पूर्वराज्ञां कथाश्रय़ैः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति