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वन पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
आय़सं हृदय़ं नूनं तस्य दुष्कृतकर्मणः |  ५   क
यस्त्वां धर्मपरं श्रेष्ठं रूक्षाण्यश्रावय़त्तदा ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति