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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
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व्राह्मण उवाच
अर्थानिष्टान्कामय़ते स्वभावः; सर्वान्द्वेष्यान्प्रद्विषते स्वभावः |  २   क
कामद्वेषावुद्भवतः स्वभावा; त्प्राणापानौ जन्तुदेहान्निवेश्य ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति