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विराट पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्सत्रं प्रविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु |  ५   क
गूढभावेषु छन्नेषु काले चोदय़मागते ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति