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उद्योग पर्व
अध्याय २८
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युधिष्ठिर उवाच
यत्राधर्मो धर्मरूपाणि विभ्र; द्धर्मः कृत्स्नो दृश्यतेऽधर्मरूपः |  २   क
तथा धर्मो धारय़न्धर्मरूपं; विद्वांसस्तं सम्प्रपश्यन्ति वुद्ध्या ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति