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उद्योग पर्व
अध्याय २८
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युधिष्ठिर उवाच
लुप्ताय़ां तु प्रकृतौ येन कर्म; निष्पादय़ेत्तत्परीप्सेद्विहीनः |  ४   क
प्रकृतिस्थश्चापदि वर्तमान; उभौ गर्ह्यौ भवतः सञ्जय़ैतौ ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति