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भीष्म पर्व
अध्याय २८
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श्रीभगवानु उवाच
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवय़ा |  २०   क
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति