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भीष्म पर्व
अध्याय २८
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श्रीभगवानु उवाच
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् |  २७   क
उपैति शान्तरजसं व्रह्मभूतमकल्मषम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति