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द्रोण पर्व
अध्याय ९५
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सञ्जय़ उवाच
तेषामिषूनथास्त्राणि वेगवन्नतपर्वभिः |  ३३   क
अच्छिनत्सात्यकी राजन्नैनं ते प्राप्नुवञ्शराः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति