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द्रोण पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
व्यसृजत्तोमरान्मूर्ध्नि श्वेताश्वस्योन्ननाद च |  १२   क
तैरर्जुनस्य समरे किरीटं परिवर्तितम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति