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द्रोण पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
यद्यहं व्यसनी वा स्यामशक्तो वा निवारणे |  २०   क
ततस्त्वय़ैवं कार्यं स्यान्न तु कार्यं मय़ि स्थिते ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति