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द्रोण पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
सवाणः सधनुश्चाहं ससुरासुरमानवान् |  २१   क
शक्तो लोकानिमाञ्जेतुं तच्चापि विदितं तव ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति