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द्रोण पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
चतुर्मूर्तिरहं शश्वल्लोकत्राणार्थमुद्यतः |  २३   क
आत्मानं प्रविभज्येह लोकानां हितमादधे ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति