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द्रोण पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
एवं वरमहं श्रुत्वा जगत्यास्तनय़े तदा |  २९   क
अमोघमस्त्रमददं वैष्णवं तदहं पुरा ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति