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द्रोण पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
तन्मय़ा त्वत्कृतेनैतदन्यथा व्यपनाशितम् |  ३४   क
विय़ुक्तं परमास्त्रेण जहि पार्थ महासुरम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति