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वन पर्व
अध्याय ७
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वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ सञ्जय़ जानीहि भ्रातरं विदुरं मम |  ७   क
यदि जीवति रोषेण मय़ा पापेन निर्धुतः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति