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कर्ण पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
वय़ं हंसाश्चरामेमां पृथिवीं मानसौकसः |  २०   क
पक्षिणां च वय़ं नित्यं दूरपातेन पूजिताः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति