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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
यदि मेऽस्ति तपस्तप्तं यदि दत्तं हुतं यदि |  ९६   क
श्वश्रूश्वशुरभर्तॄणां मम पुण्यास्तु शर्वरी ||  ९६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति