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कर्ण पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
शतमेकं च पातानां पतितास्मि न संशय़ः |  २३   क
शतय़ोजनमेकैकं विचित्रं विविधं तथा ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति