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कर्ण पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
वृक्षाग्रेभ्यः स्थलेभ्यश्च निपतन्त्युत्पतन्ति च |  ३६   क
कुर्वाणा विविधान्रावानाशंसन्तस्तदा जय़म् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति