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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
यच्चापि तीर्थानि चरन्नगच्छं द्वारकां प्रति |  ६३   क
तत्राहमपि ते भक्तिमर्जुनं प्रति दृष्टवान् ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति