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कर्ण पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
ततो भीः प्राविशत्काकं तदा तत्र विचेतसम् |  ४०   क
द्वीपद्रुमानपश्यन्तं निपतन्तं श्रमान्वितम् |  ४०   ख
निपतेय़ं क्व नु श्रान्त इति तस्मिञ्जलार्णवे ||  ४०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति