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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
विशेषो हि त्वय़ा भद्रे व्रते ह्यस्मिन्समर्पितः |  ४८   क
तथा चेदं ददाम्यद्य निय़मेन सुतोषितः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति