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कर्ण पर्व
अध्याय २८
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काक उवाच
उच्छिष्टदर्पितो हंस मन्येऽऽत्मानं सुपर्णवत् |  ४९   क
अवमन्य वहूंश्चाहं काकानन्यांश्च पक्षिणः |  ४९   ख
प्राणैर्हंस प्रपद्ये त्वां द्वीपान्तं प्रापय़स्व माम् ||  ४९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति