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कर्ण पर्व
अध्याय २८
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काक उवाच
आरोप्य पृष्ठं काकं तं हंसः कर्ण विचेतसम् |  ५३   क
आजगाम पुनर्द्वीपं स्पर्धय़ा पेततुर्यतः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति