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कर्ण पर्व
अध्याय २८
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काक उवाच
उच्छिष्टभोजनात्काको यथा वैश्यकुले तु सः |  ५५   क
एवं त्वमुच्छिष्टभृतो धार्तराष्ट्रैर्न संशय़ः |  ५५   ख
सदृशाञ्श्रेय़सश्चापि सर्वान्कर्णातिमन्यसे ||  ५५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति