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कर्ण पर्व
अध्याय २८
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काक उवाच
यत्र व्यस्ताः समस्ताश्च निर्जिताः स्थ किरीटिना |  ५७   क
सृगाला इव सिंहेन क्व ते वीर्यमभूत्तदा ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति