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सभा पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
ऋद्ध्या च वरुणं देवं स्पर्धमानो युधिष्ठिरः |  १५   क
षडग्निनाथ यज्ञेन सोऽय़जद्दक्षिणावता |  १५   ख
सर्वाञ्जनान्सर्वकामैः समृद्धैः समतर्पय़त् ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति